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Wednesday, March 11, 2009

चुनाव भारत-भाग्य बदलने का दुर्लभ अवसर

चुनाव भारत-भाग्य बदलने का दुर्लभ अवसर हैं -
पूरी तरह राष्ट्रीय हितों के प्रति समर्पित राजनीतिक नेतृत्व की जरूरत हैं

पार्टी और विचारधारा को तिलांजलि देकर राजनेता चुनाव की इस तरह तैयारियां कर रहे दिखते हैं मानो भारत की संसद में प्रवेश राष्ट्र पर छाए संकटों के समाधान के लिए नहीं, बल्कि व्यक्तिगत ऐश्वर्य और सत्ता सुख में हिस्सेदारी के लिए हो। जिस प्रकार टिकटों की बिक्री और चुनाव खर्च के लिए इकट्ठा किए जा रहे धन का ब्यौरा सामने आ रहा है उससे तो यही अंदाजा लगता है कि देश अभी भी उन राजनेताओं की प्रतीक्षा में है जो चुनावी अखाड़े को पूंजी निवेश का लाभप्रद क्षेत्र मानने के बजाय अपने हितों को दांव पर लगाते हुए राष्ट्रीय हितों को आंखों में धारण कर सत्ता के सूत्र संभालेंगे। भारत विभाजन के बाद से आज तक राजनीति दुराचरण के धब्बों से कलंकित रही है। 1947 में जब भारतीय सैनिक कश्मीर पर अचानक धोखे से हुए पाकिस्तानी हमले झेल रहे थे तो लंदन में तत्कालीन उच्चायुक्त कृष्णामेनन से जुड़ा जीप घोटाला हुआ। फिर मूंदड़ा कांड, नागरवाला और बोफोर्स कांड, सुखराम मामला, चारा घोटाला, तहलका, पनडुब्बी खरीद, गेहूं आयात घोटाला जैसे प्रकरण राजनेताओं की साख पर आंच डालते रहे।
एक ओर सामान्य नागरिक दुनिया भर में अपनी व्यक्तिगत मेधा और निपुणता के बल पर भारतीय पहचान को श्रेष्ठता का सर्वोच्च स्थान दिला रहे थे और भारतीय कंपनियां विश्वविख्यात ब्रांड अधिग्रहीत कर रही थीं तो दूसरी ओर राजनेता बोरियां भर-भर कर नोट इकट्ठा कर अपनी आत्मा के बजाय तिजोरी के निर्देश पर भारतीय संसद में सांसद धर्म निभाने का परिदृश्य उपस्थित कर रहे थे। क्या ऐसे टिकाऊ और बाजारू लोगों के सौदों पर टिकी सरकार चुनना राष्ट्रहित में होगा? जिस देश की प्रजा अपने शासक को चुनने में लापरवाही बरते या उसका चुनाव जाति, भाषा और धनबल के प्रभाव की कसौटी पर करे, क्या उसका कभी अच्छा परिणाम निकल सकता है?
कुछ ऐसी स्थिति पिछली शती के प्रारंभ में ब्रिटेन में थी, जब हाउस आफ ला‌र्ड्स की सीटें नीलाम हुआ करती थीं। फिर भी वहां की जनता ने अपने देश, काल और परिस्थिति के अनुरूप स्वयं को बदला और एक ऐसे प्रजातंत्र का ढांचा मजबूत किया जो राज-वंश भी परंपरागत रूप से जीवित रखे हुए है और जहां प्रखर राष्ट्रवाद हर नीति को निर्देशित करता है। अमेरिका और चीन भी भले ही परस्पर अत्यंत भिन्न समाज हों, लेकिन अपने देश को दुनिया में सबसे श्रेष्ठ, समृद्ध और शक्तिशाली बनाना वहां की राजनीति का मुख्य धर्म परिलक्षित होता है। भारत के सामने आसन्न चुनावों ने यह चुनौती उपस्थित की है कि जनता ऐसे सांसदों को चुने जो राष्ट्र-धर्म के प्रति सजग और प्रतिबद्ध हों। दुर्भाग्य से वर्तमान चुनाव पद्धति में सिर्फ जीतना ही एकमात्र कसौटी है, चरित्र और गुण का स्थान यदि कभी आया भी तो बाद में आता है। फलत: ऐसे सांसद चुने जाते हैं जिन्हें न अपने देश के इतिहास का ज्ञान होता है, न भूगोल का और न ही राष्ट्रीय संघर्ष के विभिन्न सोपानों से वे परिचित होते हैं। वे भूल जाते हैं कि उनसे पहले भी अनेक मंत्री हो चुके हैं, जिनमें से कोई भी अपने धनबल और असीम ऐश्वर्य के कारण यशस्वी नहीं हुआ। केवल पैसा और पद कभी प्रतिष्ठा नहीं दिला सकते।
जिन लोगों को सत्ता के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के बाबू और रायबहादुर बनने में शर्म नहीं आई, वैसे ही लोग आज विदेशी हितों और विदेशी मूल के नेतृत्व के सामने झुककर राष्ट्रीयता दांव पर लगा रहे हैं। जिस देश में पांच लाख देशभक्त नागरिक निर्वासित कर दिए गए हों, जहां एक करोड़ से अधिक विदेशी अवैध घुसपैठिए वोट बैंक राजनीति का संरक्षण पा रहे हों, जहां शासक को पुलिस, प्रशासन और चुनाव पद्धति में सुधार की कोई आवश्यकता ही महसूस न हो, बल्कि ब्रिटिश काल के कानून आज भी देश में लागू हों, ऐसे देश में यथास्थिति के दब्बूपन के बजाय जन-विद्रोह के परिवर्तनकारी स्वर बुलंद होने चाहिए। देश को ऐसी राजनीति चाहिए जो शत्रु के प्रति निर्गम और प्रतिशोधी हो, जो देश को सैन्य दृष्टि से विश्व में सबसे सबल बनाने के लिए प्रतिबद्ध हो तथा नि:संकोच भाव से अपने अगल-बगल के क्षेत्र पर ऐसा प्रभुत्व स्थापित करे ताकि वहां की अराजकता और तालिबानी शरारतों का हम पर असर न पड़े। चारों ओर से पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे असफल और अराजकता ग्रस्त देशों से घिरे भारत को आंतरिक और सीमावर्ती शांति के लिए ऐसा सैन्य और कूटनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना ही होगा जिसे देखकर विरोधी भयभीत रहें। आज तो पाकिस्तान और बांग्लादेश ही नहीं, श्रीलंका व नेपाल तक हमारी सुरक्षा और संवेदना की कद्र नहीं करते।
चीन के बढ़ते क्षेत्रीय विस्तार के प्रति राजनीतिक दलों में कोई दीर्घकालिक सर्वसम्मत चिंतन ही नहीं है। तीस करोड़ से अधिक भारतीय आज भी गरीबी रेखा से नीचे पशुवत जीवन बिताने पर विवश हैं। गत दस वर्षों में दो लाख किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं। खेती में रासायनिक खाद और जीन अंतरित बीज के जहर फैल रहे हैं। देश की कृषि योग्य भूमि पर सिनेमा, होटल और कारखाने लगाने की अनुमति देकर अमीरों को और ज्यादा अमीर तथा भूमिपति किसानों को स्लमडाग बनाया जा रहा है। ऐसे ही सांसद फिर चुने जाएं तो किस प्रकार के भारत का वे निर्माण करेंगे? भारत एक ऐसे नेतृत्व की प्रतीक्षा में है जो सबसे बड़ा तीर्थत्व गुण और शक्ति संचय में माने, जिसके प्रेरणा केंद्र और मन भारत में हों, जो दरिद्रता निवारण और विज्ञान-प्रौद्योगिकी प्रसार को देवालय निर्माण जैसा महत्वपूर्ण माने, जिसके सर्वोच्च आराध्य भारत के नागरिक हों। वर्तमान चुनाव हमें भारत भाग्य बदलने का दुर्लभ अवसर दे रहे हैं-एक ऐसा भारत भाग्य विधाता चुनें जो सच में जन-गण-मन का अधिनायक बन सके।
क्या हम परिवर्तन के लिए तैयार हैं?

1 comment:

Rakesh said...

Take the example of any real developed country, they developed because they used their own language (French, Germans, Russians, Japanese, Korean ...) in every fields (science, art....) and their thought of development was their own not copied from somewhere else. BUT we Indians think that by just copying west (science, art, culture ) we will be developed. Copy can show us little a bit development but we can't go beyond certain point by copying. India must need to develop its own very own development.