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Thursday, August 18, 2011

1977 जैसा जन ज्वार

18/August/2011

दैनिक जागरण
तरुण विजय


3 comments:

Inferno said...

Even if our law makers are hopeless, it is dangerous for the common man to assume the role of a law maker. Let only those whose job it is to enact laws do their duty.

SrEyAn swadharmO viguNah, Para dharmathsvanuShThithaan
swadharmEni dhanam SrEyam, para dharmO bhayaa vahaha.


"Better one's own duty even if it is lacking in merit. To attempt to do someone else’s job is dangerous"

Ashwini Kumar said...

सही लिखा है तरुण जी, पर सत्ता कि ये सोच कब बदलेगी? १९७७ में उठा जन ज्वार राजनेतिक था, िवपक्षी दल सब एक साथ थे, पर ये जन ज्वर स्वत स्फूर्त है, विपक्ष अभी भी उहापोह में ही दिखता है, नफा नुक्सान देख रहा है, आपकी पार्टी भी असमंजस में दिख रही है, आखिर क्यों?
क्यों नहीं आप जैसे लोग विपक्ष में आम सहमति बनाने का प्रयास करते हैं? बहुत उम्मीदें हैं इस देश के युवाओं को... ये यौंग इंडिया उस हर पार्टी को सजा दे सकता है जो उसकी आवाज नहीं सुन रही है. अन्ना हजारे के समर्थन में जो जन सैलाब है उसकी पदचाप सुनीये ये देश के यूथ की आवाज़ है इसे न सुनना सभी को भरी पड़ेगा...पार्टी लाइन से बाहर निकालें...
अश्विनी कुमार

Charan said...

BJP ceding space to Anna

It is ok to remember Pokhran everyday. It is ok to remember Kargil everyday. It is ok to remember Shyama Prasad everyday. It is ok to remember Savarkar everyday.

But it is not ok to forget the common man. It is not ok to forget issues. It is not ok to forget our responsibilities as the main opposition party. It is not ok to forget the present. It is not ok to lose the people's faith.