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Tuesday, August 18, 2009

मूल्यों के संकट की महामारी

जागरण
Aug 09-2009
तरुण विजय
नदियों को सुखाकर जहा आवासीय कालोनिया बनें, पशुओं को अकथनीय ढंग से तड़पा-तड़पा कर उनकी खाल से बने कोट 'संभ्रात और कुलीन' लोग पहनें, खेती की जमीन पर सिनेमाहाल और मल्टीप्लेक्स खोले जाएं तथा रासायनिक खाद से 'जल्दी और ज्यादा' फसल उगाही के लोभ में जमीन को जहरीला बनाया जाए वहा स्वाइन फ्लू तथा एड्स जैसे रोग नहीं फैलेंगे तो क्या अमृत वर्षा होगी? जिन रोगों से आज पृथ्वी आक्रांत है और अरबों डालर खर्च करने के बाद भी जिनसे निजात पाना संभव नहीं हो रहा है वे सब मनुष्य की अप्राकृतिक वासनाओं और जुगुप्साजनक सीमा तक पहुंची भोगलिप्साओं का स्वाभाविक परिणाम हैं। वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं में इनके समाधान खोजेंगे, पर प्रकृति पर विजय पाने की पश्चिमी मानसिकता ने पृथ्वी को आहत किया है। पहले उन्होंने दूसरी आस्था और समाज को बर्बरता से कुचला। कोलंबस की खोज के बाद चार करोड़ रेड इंडियन तो अमेरिका में स्वर्णभक्षी, ईसाइयत के आक्रामक प्रचारकों द्वारा किए गए संहारों में मार डाले गए। फिर सामी पंथों के जिहाद प्राय: छह करोड़ जानें लील गए। सामी पंथों की ही भाति तीसरा पंथ कम्युनिज्म उभरा, जिसके पुरोधाओं स्टालिन, माओ त्से तुंग और पोलपोट के शासन में अनुमानत: 12 करोड़ लोग बर्बरताओं के शिकार हुए और मारे गए। परमाणु बम जैसे जनसंहारक शस्त्र भी पश्चिम ने दिए। इन भोगवादी लिप्साओं के कारण पृथ्वी के प्राकृतिक वनों का घोर विनाश हुआ तथा मौसम में बदलाव आ गया। ग्लोबल वार्मिंग, कार्बन फुटप्रिंट आदि अंधाधुंध पश्चिमी औद्योगिकीकरण और प्राकृतिक नियमों के विपरीत जाकर अप्राकृतिक विश्व रचाने के परिणाम हैं। यह वह मानसिकता है जो पुरुष की पुरुष से शादी को स्वीकार्य, उचित व न्यायसंगत मानकर प्रकृति के नियमों का उपहास उड़ाती है, जो परिवार संस्था के पक्ष में दिए सब तर्क स्वच्छंद भोग की आधुनिक शैली में दफन करती है, जो स्त्री के मातृत्व को कारावास तथा डिस्को में बीयर पीकर गिर जाने को स्वातं˜य चेतना का प्रतीक मानती है, जो स्त्री की स्त्री से शादी और 'वन नाइट स्टैंड' को पेज थ्री की ग्लैमरस खबर बनाती है, जो पशु-पक्षियों को निर्दयता से मारकर उनके मास भक्षण को 'नवीन युग' का प्रतीक मानती है।

फिर स्वाइन फ्लू, एड्स, बर्ड फ्लू और मैड काऊ रोग क्यों नहीं हों? एक साल में सत्तर हजार किसानों ने भारत में आत्महत्या की। ये सत्तर हजार किसान कितनी जमीन में खेती करते थे? कितना अन्न उगाते थे? किसी ने जानने की कोशिश नहीं की। सत्तर हजार अन्नदाता भूस्वामियों की आत्महत्या ने देश का दिल नहीं दुखाया। आज व्यक्ति का मूल्याकन धन कमाने की कला में प्रवीणता से माना जाता है, विधि-विधान के औचित्य-अनौचित्य का कोई महत्व नहीं है। अरुणाचल के जंगलों से प्लाइवुड बन गई, वरुणा और असि पर मकान बन गए, भारतपुझा नदी से लेकर यमुना तक गंदा नाला बन गई है या सूख रही है, माता-पिता के लिए अनाथालय खोलने वाले करोड़पति बेटे हैं तो डल झील के सिकुड़ते जाने से लापरवाह जिहादी सिर्फ सांप्रदायिक नफरत के लिए मनुष्यों का रक्त बहा रहे हैं, तो बचेगा क्या? स्वाइन फ्लू का अर्थ है सुअर के संक्रमण से पैदा हुआ बुखार। सुअर को मारने के अजब तरीके अपनाए जाते हैं। पहले उसके नथुने काटे जाते हैं, वह तड़पता है, फिर उस पर नमक डालते हैं, वह फिर तड़पता है, इससे उसका मास इकट्ठा होता है, फिर उसे सरियों से पीटते हैं, इससे उसका मास नरम होता है। इससे भी ज्यादा बर्बरतापूर्वक गाय को मारा जाता है। ऐसे में स्वाइन फ्लू क्यों न हो?

हम वह बन जाना चाहते हैं जिसे पश्चिमी समाज अब त्याग रहा है। हम परिवार तोड़ रहे हैं, वे परिवार बचाने के तरीके ढूंढ रहे हैं। हम अपने बच्चों को न्युक्लियर फैमिली यानी दादा-दादी, नाना-नानी रहित परिवार बसाने के फैशन से जोड़ रहे हैं तो वे फैमिली ट्री यानी अपने पुरखों की वंशावली ढूंढने में हजारों डालर खर्च करते हैं। हम गे-शादियों को कानूनी जामा पहनाकर खुद को आधुनिक समझते हैं। बच्चों की परवरिश ठीक से संस्कारित कैसे हो, इसके उपाय ढूंढने भारत आते हैं। हमारे शासक और विपक्षी दल सत्ता, वैभव और व्यक्तिगत गुटबाजी को देश सेवा मान बैठे हैं। किसी भी पार्टी में संस्कारित राष्ट्रीय जीवन बचाने के संदर्भ में चर्चा और चिंतन करने का वक्त नहीं है। हमने कभी यह नहीं सुना कि कोई राजनीतिक दल देश की स्वास्थ्य सेवाओं संबंधी नीति पर राष्ट्रीय संगोष्ठी कर रहा है। सीमावर्ती जिलों तथा संवेदनशील क्षेत्रों में, जहा आतंकवाद व्याप्त है, बच्चों की शिक्षा में क्या विशेष अवयव जोड़े जा रहे हैं? क्या मणिपुर में विद्यालयों में राष्ट्रगीत पर पाबंदी और हिंदी फिल्मों की जगह कोरिया की फिल्में दिखाने से दिल्ली में बैठे किसी पक्ष-विपक्ष के नेता को दर्द होता है? लेह से तवाग तक की हिमालयी पट्टी में बच्चों का स्वास्थ्य और मानस कैसा बन रहा है, इस पर कभी संसद में चर्चा हुई? चर्चा होती है नेताओं की सुरक्षा घटाने, रोकने के बारे में।

हम मूल मानवीय संस्कारों को खत्म कर अच्छे परिणाम की आशा कैसे कर सकते हैं? इस परिदृश्य में मंगल विकास की अवधारणा सर्वाधिक उपयोगी और ग्राह्य प्रतीत होती है। प्रख्यात अर्थशास्त्री बजरंग लाल गुप्ता इन दिनों मंगल विकास की अवधारणा के कारण काफी चर्चित हैं। इस अवधारणा के मूल में मनुष्य और उसका आह्लाद है। उनका कहना है कि धन और संपदा अनिवार्यत: प्रसन्नता नहीं देते। यदि मनुष्य समाज को प्रसन्न तथा सर्वत्र सबके सुख के लिए माध्यम बनना है तो उसे प्रकृति-संरक्षण के लिए सिद्ध होकर मानवीय मूल्यों की रक्षा का दायित्व निभाना होगा। जब हम इस धर्म से च्युत होते हैं तभी स्वाइन फ्लू, एड्स, जैसे संकट आते हैं।

1 comment:

Vineet Gaurava said...



देवभूमि भारत पर महापुरुषों ने अवतार लेकर जीवन जीने का Absolute Path समय समय पर बताया है.
लेकिन हमारे समाज में किसी ने १ विषाणु फैला दिया है-अनुकरण का, दरअसल हिन्दू समाज को विश्वास ही नहीं होता की वो अग्रेसर है और अनुकरण हमारा धर्म नहीं..
देखते हैं,ये बातें समझने में कितना समय लगता है. जितना जल्द हो,मानव जाति के लिए उतना ही अच्छा..

शुभम,
विनीत गौरव