Follow me on Twitter

Monday, November 16, 2009

बेपता चिट्ठियां

जनसत्ता
15,Nov,2009
तरुण विजय

2 comments:

Dr. Milind said...

आदरणीय तरुणजी
आप के उपरोक्त लेख की सभी बातें उचित हैं. कल मैं गुणवत्ता संचलन और प पु मोहनजी के कार्यक्रम के लिए पुणे में था उन्होंने भी राज ठाकरे के विषय में कहा और अख़बारों में हमेशा की तरह तोड़ मरोड़ के लिखा गया.
पर सवाल है राज ठाकरे सफल क्यों है.(यदि उनकी सद्य सफलताओं को देखें )., अथवा इस प्रकार के अवसरवादी कुछ समय के लिए भी सही सफल हो जाते हैं.
यदि अबू आज़मी जैसे लोग किसी भी तरह से, कोई भी हथकंडा अपनाकर स्थानीय लोगों के वर्त्तमान और भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हैं तो राज ठाकरे सफल हो जाते हैं.
फिर स्थानीय जन मानस इतिहास मीमांसा नहीं करता , मध्य प्रदेश और दिल्ली के मुख्यमंत्री भी बिहारी अतिक्रमण के प्रति यही भावनाएं रखते हैं .
मैं तो समझता हूँ कि, महाराष्ट्र कि समस्या वर्त्तमान के सिमित अवसरों के कारण जन सामान्य में भय (insecurity complex ) के कारण उत्पन्न हुई है . राज ठाकरे जैसे लोग उसका फायदा उठा रहें हैं . राज को इतिहास समझाकर इसे हल नहीं किया जा सकता, इस बात को सभी ने समझना चाहिए. हम जनसामान्य से भी ये अपेक्षा नहीं रख सकते कि वे संविधान ने दिए अधिकार के कारण उत्तर भारत से हो रहे mass migration का विरोध न करें. इस आर्थिक विषय को आर्थिक नीतियों में सुधार ला कर ही हल किया जा सकता है.

Harshal said...

I completely agree on conceptual basis whatever you are saying (also in the post roughly a week back on similar issue). But isn't it true unfortunately that some parts of our country are much backward than others. I wouldn't have even minded that as the entire nation is one and the development of every single individual matters. But these regions apparently are not doing enough for their progress and the political leaders instead of focusing on that, are just cursing people like Raj Thakray. I believe at least impartial and non-political people like you have to comment also on this side of the story.