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Wednesday, November 19, 2008

खतरनाक मोड़ पर असम

दिनांक : - १७ नवम्बर २००८, दैनिक जागरण

असम में बोडो आदिवासियों के खिलाफ बांग्लादेशी घुसपैठियों की हिंसा पर चिंता जता रहे हैं तरुण विजय
एक ओर बराक ओबामा की विजय पर देश के विभिन्न शहरी वर्गों और मीडिया में हर्षोल्लास का अतिरेक दिखा तो दूसरी ओर असम में पाकिस्तानी झंडे फहराने तथा 100 से अधिक बोडो आदिवासियों को बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा मारे जाने पर सन्नाटा छाया रहा। लगभग 96 हजार हिंदू 50 शिविरों में शरणार्थी के रूप में शरण लेने पर बाध्य हो गए हैं। इस समस्या की शुरुआत कुछ समय पहले अरुणाचल प्रदेश से निकाले गए बंगलादेशियों के कारण हुई थी। ऐसी खबरे हैं कि अरुणाचल प्रदेश की सरकार ने लगभग दस हजार बांग्लादेशियों को अपने राज्य की सीमा से निकालकर असम में धकेल दिया था। इसकी प्रतिक्रिया में पहले से ही बांग्लादेशी घुसपैठ से क्षुब्ध असम के विभिन्न छात्र संगठनों ने जुलाई और अगस्त में बांग्लादेशियों की पहचान का अभियान प्रारंभ किया।
विदेशियों के भारत में आने का विरोध करने के बजाय आश्चर्यजनक रूप से असम के मुस्लिम संगठनों ने बांग्लादेशियों की पहचान के अभियान का तीव्र विरोध किया और असम अल्पसंख्यक छात्र संघ द्वारा 13 अगस्त को और मुस्लिम छात्र संघ द्वारा उदालगुड़ी में 14 अगस्त को असम बंद का आह्वान किया गया। दोनों ही बंद अप्रभावी रहे तथा इनका विशेषकर बोडो हिंदुओं द्वारा उदालगुड़ी तथा दारंग जिले में विरोध किया गया। प्रतिक्रिया में बांग्लादेशियों ने परंपरागत हथियारों से हमले किए तथा बोडो लोगों की दुकानें जला दीं। हमलों का यह सिलसिला कई दिनों तक जारी रहा। इस दौरान अनेक गांव भी जला दिए गए। हमलावरों ने पांच स्थानों पर पाकिस्तानी झंडे फहराए और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए। आश्चर्य की बात यह रही कि असम के एक पूर्व कांग्रेसी मंत्री महिबुल हक तथा असम सरकार ने न केवल हमलावर बांग्लादेशियों को संरक्षण दिया, बल्कि यह बयान भी दिया कि उदालगुड़ी में पाकिस्तानी झंडा फहराने की बात अल्पसंख्यक समाज को बदनाम करने की साजिश है। न तो मुख्यमंत्री तरुण गोगोई तथा न महिबुल हक इस बात का जवाब दे सके कि उदालगुड़ी में पाकिस्तानी झंडा फहराने की खबर इस्लामाबाद के डेली पाकिस्तान में कैसे छपी? डेली पाकिस्तान ने समाचार का शीर्षक दिया-असमियों द्वारा हरे और चांद सितारे वाले झंडे को सलाम। बाद में विस्तार से बताया गया है कि भारत सरकार की दमनकारी नीतियों से परेशान होकर असम के मुसलमान अब पाकिस्तानी झंडे को अपनी आजादी का प्रतीक मानने लगे हैं। इस समाचार में यह भी लिखा है कि असम के स्थानीय पत्रकारों ने पाड़ा और मोहनपुर गांवों में पाकिस्तानी झंडे देखे तथा उनके चित्र खींचे। इस घटना से भारत के अधिकारी स्तब्ध रह गए हैं।
असम के देशभक्त नागरिकों को सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि भारत सरकार विदेशी हमलावरों से देशभक्त नागरिकों की रक्षा करने के बजाय हमलावरों के बचाव में उतर आई है। पहले से ही पूर्वांचल के विभिन्न प्रांतों में अलगाववादी विद्रोही आंदोलन चल रहे हैं। राजग सरकार के राज में भी त्रिपुरा के आतंकवादियों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चार वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का अपहरण कर एक साल बाद उनकी हत्या कर दी थी। नगालैंड में तो महात्मा गांधी की प्रतिमा भी स्थापित नहीं की जा सकती। मणिपुर में हिंदी की फिल्मों तथा राष्ट्रगीत गाए जाने पर प्रतिबंध हैं। असम में 42 से अधिक विधानसभा क्षेत्र बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा नियंत्रित किए जाने लगे हैं। अब उनका दुस्साहस इतना अधिक बढ़ गया है कि जिस क्षेत्र पर वे कब्जा करना चाहते हैं वहां बेहिचक हमला कर तथा हिंदुओं के गांव जलाकर अपना कारोबार स्थापित कर लेते हैं। बांग्लादेशियों का इतना अधिक दबाव व प्रभाव है कि सरकार ने मुस्लिम हमलावरों को दोष देने के बजाय सारे मामले को भ्रमित करने के लिए कहा कि ये हमले उल्फा तथा नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आफ बोडोलैंड ने करवाए हैं। मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने नई दिल्ली में राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक के बाद पत्रकारों को बयान दिया कि असम में एक भी बांग्लादेशी नहीं है और जो यहां अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के होने की बात करते हैं वे असम को बदनाम करने की साजिश कर रहे हैं। मुख्यमंत्री के इस बयान से बांग्लादेशी घुसपैठियों का दुस्साहस और बढ़ गया। इसके विरोध में उदालगुड़ी और दारंग के लोगों ने तीव्र क्षोभ प्रकट किया तथा अखिल बोडो छात्र संघ ने सारे घटनाक्रम का सिलसिलेवार तथ्यात्मक विवरण एक ज्ञापन में प्रधानमंत्री को भेजा है। जो प्रधानमंत्री यह स्वीकार करते हैं कि विदेश में आतंक के आरोप में एक भारतीय मुस्लिम की गिरफ्तारी के समाचार से उन्हें नींद नहीं आई उनके कार्यालय से इस ज्ञापन का प्राप्ति स्वीकार भी नहीं भेजा गया। बोडो लोगों ने अपनी आंखों से घुसपैठियों को अपने घर जलाते देखे हैं। उनके भीतर पनप रहे गुस्से का अंदाजा लगाना दिल्ली के सुल्तानों के लिए कठिन है। उनका सब कुछ राख के ढेर में बदल गया। उनकी जमीनों पर हमलावरों ने कब्जे कर लिए। लोगों को मार दिया गया, फिर भी किसी ने उनके प्रति सहानुभूति प्रकट नहीं की।
मालेगांव में हुई घटना पर सारे देश के सेकुलर मीडिया तंत्र के साथ-साथ महाराष्ट्र सरकार और रक्षा मंत्रालय में उबाल आ गया है। एक साध्वी को गिरफ्तार कर तथा अप्रमाणित कथानकों के आधार पर उसे हिंदू आतंकवादी घोषित कर सेकुलर जलसा मना रहे हैं, लेकिन असम में घुसपैठियों के हमलों के शिकार लोगों की व्यथा पर न तो कहीं कोई चर्चा होती है और न ही सरकार हमलावर आतंकवादियों के विरुद्ध कार्रवाई करती है। उल्टे इस माहौल में कांग्रेस के ही एक मुख्यमंत्री का बयान आता है कि वह सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को प्राथमिकता देंगे। मजहबी विद्वेष और हिंसा को सेकुलर राजनीति कवच प्रदान कर रही है। क्या ओबामा की जीत और टिकट वितरण के झगड़ों में व्यस्त दिल्ली सुरक्षा पर घुसपैठियों के आघात का शोर सुनेगी? (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

2 comments:

anjani said...

aap kafi achchha likh rahe hain lekin usi star ka JANSATTA me kyo nahi likhate jabki vaha aapki jyada jaroorat hai.sajid rashid aapse behtar ho gaya hai.kahani mat banaiye ideological likhiye.

ABOUT ME said...
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